Heritage and Livelihood Inter Generational Skill Transmission & Traditional Occupations in the Thar Desert
CSDC के तत्वाधान में “HERITAGE AND LIVELIHOOD: INTER-GENERATIONAL SKILL TRANSMISSION & TRADITIONAL OCCUPATIONS IN THE THAR DESERT” विषय पर व्याख्यान का रिपोर्ट:
CSDC के तत्वाधान में दिनांक 20.12.2025, दिन शनिवार को “Heritage and Livelihood: Inter-Generational Skill Transmission & Traditional Occupations in the Thar Desert” विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया | कार्यक्रम की अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के यूरोपियन अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफेसर डा. शीतल शर्मा ने की और गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में ओ. पी. जिंदल ग्लोबल लॉ विश्वविद्यालय के विधि विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. ऐश्वर्या पंडित ( ‘इंडियन रेनेसान्स: द मोदी डीकैडस’ पुस्तक की लेखिका लिखी) उपस्थित थी |
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में डॉक्टर आकांक्षा चौधरी, असिस्टेंट प्रोफेसर, आईआईटी जोधपुर ने इस विषय पर मुख्य व्याख्यान दिया |
डॉ आकांक्षा चौधरी ने अपने शोध आधारित व्याख्यान में बताया कि किस तरह राजस्थान के सुदूरपुर ब्लॉक में परंपरागत कलाएं एक पीढ़ीं से दूसरे पीढ़ीं तक नहीं जा पा रही हैं और इस बीच बाजार किस तरह उन्हें प्रभावित कर रहा है | केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से ऐसे हस्तशिल्पकारों को कुछ सहायता योजनाओं के माध्यम से ज़रूर दी जा रही है परंतु यह पर्याप्त नही है | इनके अनुसंधान में इस बात पर बल दिया गया कि समाज में बुनकरों को उचित स्थान, उनके काम और कारीगरी को सम्मान एवं पारिश्रमिक दोनों मिलने की जरूरत है तभी ऐसी बहुत सारी कलाएं विलुप्त होने से बचेंगी |
संस्थान के मानद निदेशक प्रोफेसर राकेश सिन्हा (पूर्व सांसद, राज्यसभा) ने अपने उद्बोधन में इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि हस्तशिल्पकार अंग्रेजों के समय भी गुलामी की अर्थव्यवस्था से बचे रहेl शहरीकरण की व्यवस्था ने पश्चिमीकरण को अपनाया परंतु ग्रामीण व्यवस्था में आज भी हस्तशिल्प कलाकार है | उन्होंने उदाहरण के तौर पर बिहार के बेगूसराय ज़िले के मंसूरचक के मिट्टी के मूर्ति बनाने वाले कलाकारों का उल्लेख करते हुए कहा की उनका हुनर तभी सम्मान पायेगा जब बाजार के साथ समाज और राज्य अपनी सकरात्मक भूमिका निभायेगा. उनका इशारा भौगोलिक संकेतो (Geographical Indication Tag) की तरफ था जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाता है. उन्होंने आगे यह कहते हुए बल दिया कि कलाकार की कला तभी बचेगी जब कलाकार पश्चिम की शोषणकारी व्यवस्थाओं से बचेगा. यह सिर्फ पश्चिम की व्यवस्था नहीं बाजार आधारित शोषण पर आधारित व्यवस्था हैl
कार्यक्रम में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न विश्विद्यालयों और कॉलेजों के प्रोफेसर और शोध छात्र उपस्थित थे| दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर राकेश पांडेय, प्रोफेसर शंभुनाथ दुबे, प्रो हरेंद्र सिंह, विधि विभाग की प्रो आलोक पांडेय, डॉ सोहन, डॉ, कुंदन सहित अनेक शोध छात्रों ने अपने सरोकारो से भरे सवालों के माध्यम से परिचर्चा को सामयिक और ज्ञानवर्धक बनाया|
कार्यक्रम के अंत में IGNOU की प्रोफेसर कौशल पवार नें अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया| परिचर्चा का संचालन दिल्ली विश्विद्यालय के प्रो सुमन कुमार ने किया और CSDC के तरफ से इस सफ़ल कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ राम बिलाश यादव, डॉ मीनू कुमारी, CSDC के ऑफिस सहायक विकाश कुमार और एबी थॉम सुनील सहित सभी के प्रयासों की सराहना की| अंत में चाय और नाश्ते के साथ फिर एक नये विषय पर परिचर्चा आयोजित करने के वादे के साथ यह कार्यक्रम समाप्त हुआ |

